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Sunday, 11 January 2015

उदास मैं गया था गुलों के दयार में.....

                             (1)
 फूलों का प्यार देखकर हैरान रह गया
 तमाम रंग मेरे बदन पर चढ़ा दिया
उदास मैं गया था गुलों के द़यार में
खुशबू नें मेरे दिल का तब़स्सुम बढ़ा दिया।
                              (2)
एक लड़की के जीवन की यही रस्मो-रिवायत है
बचपन के एक आँगन से रिश्ता तोड़ जाती है
सबसे बड़ी हिज़रत तो एक बेटी की हिज़रत है
परायों के लिये जो माँ का आँचल छोड़ जाती है।
                            (3)
दुश्मन की मौंत पर मेंरे आँसू छलक गये
खुद़ गया और मेरी अना साथ ले गया
उसके बगैर ज़िन्दगी वीरान हो गयी
अपनें वज़ूद का मुझे एहसास दे गया।
                            (4)
सारा अनाज़ मालिकों के घर चला गया
सब मज़दूर की मेंहनत थी ज़मीदार की नहीं
जुगुनूँ नें कहा चाँद से ललकार मुझमें
रोशनीं तो बहुत कम है पर उधार की नहीं।

       -------राजेश कुमार राय।-----