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Saturday, 21 September 2019

लौट चलो ऐ शह्र के लोगों-------------

सावन भादों बीत रहा है असमंजस के भावों में
लौट चलो ऐ शह्र के लोगों अपने अपने गांवों में

जिन पेड़ों को काट रहे हो उसने तुम को पाला है
सारा बचपन तुमने बिताया उन पेड़ों की छावों में

           --------राजेश कुमार राय---------

3 comments:


  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना 24 सितंबर 2019 के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद

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  2. जिन पेड़ों को काट रहे हो उसने तुम को पाला है
    सारा बचपन तुमने बिताया उन पेड़ों की छावों में..

    हम मनुष्यों का स्वार्थ इतना प्रबल हो गया है कि भावना,संवेदना ही नहीं आत्मा भी मर गयी है। स्वहित में किसी को काट रहे हैं, किसी को कुचल रहे हैं , किसी की मासूमियत की हत्या कर रहे हैं और फिर ठहाके लगा रहे हैं।
    पेड़ की बात करूं तो हमारे शहर में भद्रजनों का एक मोहल्ला है नाम है बदली कटरा पिछले दिनों एक मॉल के सामने लगे वर्षों पुराने कदम के पेड़ को मैंने सुबह कुछ लोगों द्वारा चुपके-चुपके काटते देखा मैंने सोशल मीडिया पर वह फोटो पोस्ट किया , तो एक पावरफुल माननीय प्रतिनिधि का फोन आया - " शशि भाई इस प्रकरण को न उछाले, हम यहां बिजली का ट्रांसफार्मर लगवाने जा रहे हैं।"
    एक दिन देखा कि सुबह सभ्य समाज के लोग वहां खड़े मुस्कुरा रहे थें और कुल्हाड़ी से आखरी प्रहार उस पेड़ के तने पर दिया जा रहा था, पेड़ धराशाई हो गया। वहां मॉल का जनरेटर रखा हुआ है। मोहल्ले के एक बुजुर्ग को इस पेड़ को कटता बहुत दुख हुआ था। इसी के छाव में उन्होंने अपना बचपन गुजारा था।
    सो, उन्होंने ही मुझे इसकी सुरक्षा के लिए कुछ करने को कहा था। लेकिन सत्ता के समक्ष एक मामूली पत्रकार कितना संघर्ष करें । जब भद्र लोग ही संवेदनहीन होकर अपने ही आश्रयदाता की मौत पर ताली बजा रहे हो..।

    प्रस्तुति की यह रचना मुझे विशेष करके अच्छी लगी और भी पेड़ों के कटने के कई संस्करण याद हैं। विशेषकर 20 वर्षों तक शास्त्री पुल पर मैं जिस पेड़ के नीचे गर्मी, बरसात और जाड़े में खड़ा रहता था। वह पेड़ काट दिए गए ।अब वहां यात्री निवास बना है, जो धूप में तपता है।

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  3. बिल्कुल सार्थक और सटीक लेखन ।
    अति उत्तम।

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