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Friday, 30 December 2016

बेटी परायी हो गयी, इक रूख़सती के बाद -------------

तूफ़ान हँस रहा है कश्ती के हाल पर
कश्ती को भरोसा है समंदर की चाल पर।

चिड़िया चहक रही है पेड़ों की डाल पर
एक शेर लिख दिया है तसव्वुर के गाल पर।

बेटी परायी हो गयी इक रूख़सती के बाद
आँसू तड़प के गिर पड़े मेरे रूमाल पर।

वो आग बरसता है तो पानी भी बरसता है
हम सब को भरोसा है खुद़ा के कमाल पर।

हाँलाकि हकिक़त थी, जुबाँ से निकल गयी
अब कुछ नहीं कहना मुझे उसके मलाल पर।

हरगिज़ न फँसेंगे, था परिन्दों का फैसला
हैरान रह गया था शिकारी भी जाल पर।

सरहद से जंग जीतकर लौटेगें ये जवान
फक्र है इस देश को माटी के लाल पर।

      --------राजेश कुमार राय।--------

Tuesday, 15 November 2016

पत्थर के पैरहन में जंगल की ज़िदगी--------

इक रेत की दीवार फिसलती चली गयी
बुनियाद भी कमजोर थी हिलती चली गयी।

उम्मीद थी कि फिर से मिलेंगे जरूर हम
हिज्र की इक शाम थी ढ़लती चली गयी।

ख़ामोश ही रहेंगे यही सोच रहा था
पर बात जो निकली तो निकलती चली गयी।

जुगनूँ जो आफ़ताब की इज्ज़त न कर सका
जुबाँ  खुली तो आग उगलती चली गयी।

पत्थर के पैरहन में जंगल की ज़िदगी
बस एक ही लिबास में चलती चली गयी।

हसरत की इंतहा ने उसे तोड़ दिया है
तक्द़ीर ही खराब थी छलती चली गयी।

तहज़ीब मिट रही है रिश्तों के बीच से
तरक्की के साथ दुनियाँ बदलती चली गयी।

      ---------राजेश कुमार राय।--------

Sunday, 2 October 2016

क्या नेकियाँ भी छीन लेगा नामए आमाल से !-----

                       (1)
मौसम के परिंदों नें इक आह भरी ऐसी
जाता हुआ बादल भी पल भर को ठहर जाये।

                       (2)
दुनियाँ में चमकते हैं, वो लोग बहुत अक्सर
जो खुद को जलाकर के जग रौशन करते हैं।

                       (3)
मुहब्बत की तश्नगी है, ऐसे न बुझेगी
आ मिल के इनकी आसूँओं से प्यास बुझा दें।

                       (4)
सब छीन लेता है वो अपने बाजुओं के जोर से
क्या नेकियाँ भी छीन लेगा नामए आमाल से !

                       (5)
मेरे दस्तक मे जाने कौन से अल्फाज़ बसते हैं
मेरा महबूब मेरी हर सदा पहचान लेता है।

                       (6)
अगर प्रतिकार करना है, कलम को हाथ में ले लो
अदब के हाथ में खंज़र कभी शोभा नहीं देता।

         ----------राजेश कुमार राय।----------
                 

Saturday, 13 August 2016

सितारे पूछते हैं आसमाँ से, ऐ जमीं वालों...........

किसी के नाम पर आँसू बहाना कब तलक होगा
नसों के खून को जिंदा जलाना कब तलक होगा।

बहुत आँसू बहाते हैं, तुम्हारी याद के मंज़र
तुम्हारी याद मे खुद को रूलाना कब तलक होगा।

उन्हें कुछ मांगना है तो हुकूमत से ही मांगे वो
बता मासूम ही उनका निशाना कब तलक होगा।

किसी के दर्द मे फिर दर्द देकर क्या किया तुमने
कि ऐसे हौसलों को आजमाना कब तलक होगा।

कभी मुस्कान देते हो कभी तुम छीन लेते हो
कभी ऊँचा उठाना फिर गिराना कब तलक होगा।

सितारे पूछते हैं आसमाँ से ऐ जम़ी वालों
किसी का पर कतरना फिर उड़ाना कब तलक होगा।

गुनाहों की सजा ऐसी मुकर्रर कर मेरे मौला
खुली दुनियाँ दरिंदों का ठिकाना कब तलक होगा।
     
           --------राजेश कुमार राय।-------

Saturday, 18 June 2016

टूटने का वहम् पाल के बैठे हैं ये रक़ीब------

तेरी बद्दुआ भी द़िल से लगाऊँगा देखना
शाम ढ़ले घर तेरे आऊँगा देखना।

बेटी है मेरी, खून है, और लख़्ते-ज़िगर भी
उसके लिये हर बोझ उठाऊँगा देखना।

टूटने का वहम् पाल के बैठे हैं ये रक़ीब
मर जाऊँगा पर सर न झुकाऊँगा देखना।

तन्हा हुआ तो क्या हुआ ! इक मैकद़ा तो है
सारी दुआ साकी पे लुटाऊँगा देखना

तेरे लिये ऐ दोस्त जरूरी हुआ अगर
उस बेवफ़ा से हाथ मिलाऊँगा देखना।

हालांकि तेरी रूह मयस्सर न हो सकी
वादा किया था जो भी निभाऊँगा देखना।

दुश्मन है मेरा लाख, मगर वक्त पे "राजेश"
नशेमन मे लगी आग बुझाऊँगा देखना।

         ------राजेश कुमार राय।-------

Thursday, 19 May 2016

रंग ला रहा है चराग़ों का फैसला............

                    (1)
किसी को दर्द क्या देना !  किसी से दुश्मनी कैसी !
ये तेरा ज़िस्म फ़ानी है किसी दिन रूठ जायेगा।

                   (2)
बुजुर्गों के लिये थोड़ी मुहब्बत द़िल मे रख लेना
मुसलसल उम्र ढ़लती है शज़र गिर जायेगा एक दिन।

                   (3)
बड़ी देर तक खड़ा था आईने के रूबरू
लगता था मेरे अक्स मे कोई और आ गया।

                   (4)
रंग ला रहा है चराग़ों का फैसला
इतना जले कि जल के हवा ही बिखर गयी।

                   (5)
जिंदा बचा हुआ है सौ वार झेलकर
जाँबाज ने शमशीर की औकात बता दी।

                   (6)
सारे ग़म डूबो देना हौसलों की चाहत से
ज़िंदगी की वादी में, तब बहार आयेगी।

      --------राजेश कुमार राय।--------

Saturday, 23 April 2016

तब जुगुनूँ भी बज़्म सजानें बैठा है-----------

शकुनी छल से आज लुभाने बैठा है
कोई युधिष्ठिर दाँव लगानें बैठा है।

सारी दुनियाँ बेंच दी बस ऐय्यासी में
अब बंदर का खेल दिखानें बैठा है।

पूरी मेहफ़िल लूट लिया जब चन्दा ने
तब जुगुनूँ भी बज़्म सजानें बैठा है।

राजा बनकर दर्द पियेगा जनता का
राज मिला तो ज़हर पिलानें बैठा है।

सारी बस्ती खाक् हुई तो क़ातिल भी
पानी लेकर आग बुझानें बैठा है।

एक दीवाना लगता है मर जायेगा
उल्फ़त में हर नाज़ उठानें बैठा है।

गद्दार पड़ोसी से थोड़ा होशियार रहो
धोखा देकर लाश बिछानें बैठा है।

हर बेटी नें ठान लिया कुछ करने की
"राजेश" खुशी से ग़ज़ल सुनानें बैठा है।

      --------राजेश कुमार राय।---------

Saturday, 19 March 2016

तेरे कंगन, तेरे पाज़ेब का फागुन है दीवाना..............

बुराई जल गई, अब हो रहीं है प्यार की बातें
कहीं पर रंग की बातें, कहीं द़िलदार की बातें।

चेहरा चाँद जैसा और त़िल भी खूबसूरत है
ज़माना कर रहा है बस तेरे रूख़्सार की बातें।

यहाँ साकी चहकती है, वहाँ माली बहँकता है
यहाँ मैख़्वार की बातें, वहाँ ग़ुलज़ार की बातें।

इन्हीं रंगों की द़रिया में चलो हम डूब जाते हैं
कभी फुर्सत में होगी, फिर तेरे संसार की बातें।

तेरे कंगन, तेरे पाज़ेब का, फागुन है दीवाना
खुमारी चढ़ गयी है अब करो झनकार की बातें।

जरा सी भूल मौसम को कहीं बे-रंग ना कर दे
चलो बच्चों से कर लेते हैं कुछ बेद़ार की बातें।

वफा की राह में"राजेश"अपना हक् अदा कर दे
ज़माना याद रखेगा, तेरे किरद़ार की बाते।

   ----------राजेश कुमार राय।-----------

Friday, 12 February 2016

दिन भर हराम कहता रहा मैंकशी को वो------

                    (1)
इंसान हूँ मगर मैं मुकम्मल न हो सका
शायद मेरे रक़ीब की कुछ बद्दुआ भी है।

                    (2)
दिन भर हराम कहता रहा मैंकशी को वो
शाम जब ढली तो मैकद़े पहुँच गया।

                    (3)
तेरा एहसान मुझ पर है इसे मैं भी समझता हूँ
मगर सबको बताकर तुमनें हल्का कर दिया इसको।

                    (4)
ज़िंदगी माँगकर ख़ुदा से क्या किया तुमनें !
ग़मे-हयात तुम्हे फिर से मार डालेगा।

                    (5)
जुगनूँ ने कहा चाँद से ललकार कर, मुझमें
रौशनी तो बहुत कम है, पर उधार की नहीं।

                    (6)
परिन्दा जब तलक उसका निवाला बन नहीं जाता
कोई मेहफ़िल मसर्रत की कभी पूरी नहीं होती।

                     (7)
इंतज़ार है तेरा, तू मेरे बज़्म में आकर
मेरे ऐतबार की ऐ दोस्त आबरू रख ले।

      -----------राजेश कुमार राय।----------