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Saturday, 22 April 2017

थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है--------

मायूसी है   भारीपन है   कुछ दर्द    पिघलना  बाकी है
थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है

दुनियां की  चालों में  फंसकर  कुछ तेवर  मेरा बदला है
ऐ यार जरा   ठोकर दे दे   कुछ और  सम्हलना बाकी है

दीपक की जलती लौ को तुम कुछ और बढ़ाकर तेज करो
जलने वाले   परवानों का  कुछ और   मचलना बाकी  है

ऐ इश्क़   बहुत उलझाया है  थोड़ा और हमें  उलझा देना
जीवन की बीच दोपहरी में थोड़ा और  उलझना बाकी है

भारत के दुश्मन  का देखो   क्या हश्र हुआ  अरमानों का
कुछ अरमां उनके कुचल गए कुछ और कुचलना बाकी है

ऐ मेरे प्रियतम  और सजो  कुछ और तुम्हारे  सजने से
द़िल मेरा बहुतों उछल चुका कुछ और उछलना बाकी है

माहौल हमारा   ऐसा हो कि    बेटी का   सम्मान बढ़े
जग थोड़ा थोड़ा बदला है कुछ और बदलना बाकी है

            ---------राजेश कुमार राय।--------

Saturday, 25 March 2017

वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है --------

आँखों   में नशेमन   ढ़ो    रहा है
किसी की याद में बस  रो रहा है

आँचल माँ का फिर से पा गया है
कई दिन से मुसलसल सो रहा है

हमेशा ज़ुल्म  से   लड़ता रहा जो
वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है

बदलते   दौर में इंसाँ की फितरत
मसल कर   फूल काँटे  बो रहा है

बहुत दिन बाद बेटी घर को आयी
खुशी  से   बाप पागल   हो रहा है

उसी को   याद करती   है रियाया
ज़माने     का दुलारा    जो रहा है

माज़ी   का द़रीचा    खोल कर के
कोई ". राजेश" उसमें   खो रहा है

   --------राजेश कुमार राय।--------

Monday, 6 February 2017

हमे भी सोचना होगा, तुम्हें भी सोचना होगा ---------

इस दौर के रिश्ते बड़े नाजुक से होते हैं
कभी वो मुस्कुराते हैं, कभी पलकें भीगोते हैं
जरा सी बात पर ही द़िल में इनके दर्द उठता है
मझधार में ही प्यार के रिश्ते डूबोते हैं
टुटन का दौर जारी है बता कैसे बचायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा ।

बहते हुए दरिया के पानी में रवानी है
इस मुल्क़ की नदियों की कुछ अपनी कहानी है
कूड़ाघर समझते हो जिसे ऐ मुल्क़ के लोगों
वही गंगा हमारे देश की सच्ची निशानी है
सब लोग सोये हैं बता कैसे जगायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

ईद और होली यहाँ मिलकर मनाते हैं
ज़ंगे-आजादी के सब किस्से सुनाते हैं
जरा सी बात क्या बिगड़ी कि नैज़े बात करते हैं
सियासी लोग अपने हक़ में ही मौका भुनाते हैं
अमन की राह में अब इक दिया कैसे जलायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

भाई का भाई अब नहीं होता यहाँ कोई
किसी का दर्द लेकर अब नहीं रोता यहाँ कोई
दूसरों का वक्त जितना मिल सके ले लो
पर वक्त अपना अब नहीं खोता यहाँ कोई
अब प्यार की गंगा बता कैसे बहायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

इस देश की बगिया में एक चिड़िया चहकती है
इस देश में ही रात की रानी महकती है
हर तरह के मौसमों का देश है मेरा
सावन में धरती भी यहाँ धानी चमकती है
आबाद हो गुलशन बता कैसे सजायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

     ---------राजेश कुमार राय।--------