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Saturday, 23 September 2017

माँ की ममता भरी दोपहर में गयी --------------

धीरे धीरे दुल्हन अपने घर में गई
सोचते सोचते  फिर पिहर में गई

आज सूरज ढलेगा तो देखेंगे हम
उसकी अस्मत कहाँ किस दहर में गई

जाने वाली हवा  से ये पूछूंगा मैं
ये बता दे तू किसके असर में गई

बालपन में मुझे  खोजते खोजते
माँ की ममता भरी दोपहर में गयी

पैर नूपुर सजा  पेट के  वासते
इक हसीना बता किस शहर में गई

सारे लोगों ने खोजा मगर ना मिला
उसको जाना था सच्ची नजर में गई

आसमां से चला कब तलक आयेगा
जिंदगी  मुफलिसों की सबर  में गई

उसकी किसमत बयाँ किस तरह मैं करूँ
जिसकी दुनियाँ ही ज़ेरे जबर में गई

    --------राजेश कुमार राय---------

Friday, 25 August 2017

इमदाद मुझे ईमानों की कुछ और जरा दे दे साक़ी-----------

सौ दर्द भरे   अफसानों में   इक मेरा भी   अफसाना है
इक तेरे तबस्सुम की ख़ातिर मुझे गीत वफा के गाना है

कुछ कर्म हमारे हाथों में  कुछ है तेरी  मंजूरी भी
दस्तूर यही इस दुनियां का कुछ खोना है कुछ पाना है

तू ही तो सब  कुछ है पर तसक़ीम  समझना है मुश्किल
कुछ को मिला सिफर हाथों में कुछ को मिला ख़जाना है

इमदाद मुझे ईमानों की  कुछ और जरा दे दे साक़ी
मैं रिन्द हुँ तेरी आंखों का उस पार मुझे भी जाना है

जब जन्म लिया इस धरती पर हक मेरा भी तसलीम करो
जिन कन्धों पर यह देश टिका उसमें मेरा भी शाना है

वादा करना कायम रहना इतना तो आसान नहीं था
तुम एक जनम में ऊब गये मुझे सातों जनम निभाना है

बस  इक जरा सी हरकत से ही प्यार तुम्हारा टूट गया
अब वक्त कहाँ है हाथों में बस जीवन भर पछताना है

             ---------राजेश कुमार राय---------

Saturday, 22 July 2017

कितना खुश है आज परिंदा ...........

कोई खुशी है या कोई गम है
आँख हमारी  क्यों पुरनम है

प्यार तुम्हारा  मेरा  ख़जाना
जितना दे दो  उतना  कम है

तेरा  बरसना या चुप  रहना
या तो  सागर या  शबनम है

कितना खुश है आज परिंदा
दश्त में जैसे एक ज़मज़म है

एक  सियासत  लाखों  चेहरे
वो   रहबर है  या   रहजन है

साथ नहीं हो फिर भी लगता
साथ  तुम्हारा   यूँ हर दम  है

बज़्मे-सुखन   में तेरा  आना
हर  मौसम  में  इक मौसम है

मेरा  दुश्मन  दोस्त है  उसका
रिश्तों  में  कितनी  उलझन है

------राजेश कुमार राय------

Wednesday, 21 June 2017

मेरी रूह तड़पती है मुकद्दर के शहर में ------------

प्यार भी  दुश्वार है  दुनियाँ की  नजर में
साहिल पे बहुत शोर है चल बीच भंवर में

इक शख़्स अपनी हार से इतना ख़फा हुआ
कहता है  जहर और दे  कश्कोले-जहर में

सोचता था तेरे नाम का एक शेर लिखूंगा
आज तक उलझा रहा ग़ज़लों के बहर में

लौट के आना था सो मैं आ गया मगर
मेरी रूह तड़पती है मुकद्दर के शहर में

हम सब को लूट कर वो विलायत चला गया
अक़्सर दिखाई देता है दुनियां की ख़बर में

पत्थर चलाये  जा रहे एक दूसरे पे सब
सूझता है कुछ नहीं जुल्मत के कहर में

मुतमइन हूँ बादशाह के हर फैसले से मैं
एक उम्मीद दिख रही है पैगामे-शजर में

       ----------राजेश कुमार राय---------

Sunday, 21 May 2017

एक मिट्टी का बदन, चंद रिदाएँ होंगी------------

ज़िस्म इंसान का है  कुछ तो   ख़ताएँ होंगी 
ज़िंदगी का है   सफ़र कुछ तो  बलाएँ होंगी

उसके लहज़े में महकती है वतन की खुशबू
कुछ मिट्टी  का असर, माँ की   दुआएँ होंगी

एक तिनके को   जलाने में   जल गई बस्ती
मेरा दावा है कि   साज़िश में     हवाएँ होंगी

हल्का हल्का ही सही   कान में  टकरातीं  हैं
खुश्क मौंसम में   परिंदों की    सदाएँ  होंगी

एक पागल   भी मोहब्बत में   सोचता होगा
मेरे महबूब के    ज़ुल्फों में      अदाएँ होंगी

अब उस पार ही  हम सब का  फैसला होगा
जैसा  किरदार है    वैसी ही     सज़ाएँ होंगी

आखिरी वक्त में   सामाने-सफ़र  क्या होगा
एक  मिट्टी का बदन,   चंद रिदाएँ होंगी
    
         --------राजेश कुमार राय-------



Saturday, 22 April 2017

थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है--------

मायूसी है   भारीपन है   कुछ दर्द    पिघलना  बाकी है
थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है

दुनियां की  चालों में  फंसकर  कुछ तेवर  मेरा बदला है
ऐ यार जरा   ठोकर दे दे   कुछ और  सम्हलना बाकी है

दीपक की जलती लौ को तुम कुछ और बढ़ाकर तेज करो
जलने वाले   परवानों का  कुछ और   मचलना बाकी  है

ऐ इश्क़   बहुत उलझाया है  थोड़ा और हमें  उलझा देना
जीवन की बीच दोपहरी में थोड़ा और  उलझना बाकी है

भारत के दुश्मन  का देखो   क्या हश्र हुआ  अरमानों का
कुछ अरमां उनके कुचल गए कुछ और कुचलना बाकी है

ऐ मेरे प्रियतम  और सजो  कुछ और तुम्हारे  सजने से
द़िल मेरा बहुतों उछल चुका कुछ और उछलना बाकी है

माहौल हमारा   ऐसा हो कि    बेटी का   सम्मान बढ़े
जग थोड़ा थोड़ा बदला है कुछ और बदलना बाकी है

            ---------राजेश कुमार राय।--------

Saturday, 25 March 2017

वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है --------

आँखों   में नशेमन   ढ़ो    रहा है
किसी की याद में बस  रो रहा है

आँचल माँ का फिर से पा गया है
कई दिन से मुसलसल सो रहा है

हमेशा ज़ुल्म  से   लड़ता रहा जो
वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है

बदलते   दौर में इंसाँ की फितरत
मसल कर   फूल काँटे  बो रहा है

बहुत दिन बाद बेटी घर को आयी
खुशी  से   बाप पागल   हो रहा है

उसी को   याद करती   है रियाया
ज़माने     का दुलारा    जो रहा है

माज़ी   का द़रीचा    खोल कर के
कोई ". राजेश" उसमें   खो रहा है

   --------राजेश कुमार राय।--------

Monday, 6 February 2017

हमे भी सोचना होगा, तुम्हें भी सोचना होगा ---------

इस दौर के रिश्ते बड़े नाजुक से होते हैं
कभी वो मुस्कुराते हैं, कभी पलकें भीगोते हैं
जरा सी बात पर ही द़िल में इनके दर्द उठता है
मझधार में ही प्यार के रिश्ते डूबोते हैं
टुटन का दौर जारी है बता कैसे बचायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा ।

बहते हुए दरिया के पानी में रवानी है
इस मुल्क़ की नदियों की कुछ अपनी कहानी है
कूड़ाघर समझते हो जिसे ऐ मुल्क़ के लोगों
वही गंगा हमारे देश की सच्ची निशानी है
सब लोग सोये हैं बता कैसे जगायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

ईद और होली यहाँ मिलकर मनाते हैं
ज़ंगे-आजादी के सब किस्से सुनाते हैं
जरा सी बात क्या बिगड़ी कि नैज़े बात करते हैं
सियासी लोग अपने हक़ में ही मौका भुनाते हैं
अमन की राह में अब इक दिया कैसे जलायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

भाई का भाई अब नहीं होता यहाँ कोई
किसी का दर्द लेकर अब नहीं रोता यहाँ कोई
दूसरों का वक्त जितना मिल सके ले लो
पर वक्त अपना अब नहीं खोता यहाँ कोई
अब प्यार की गंगा बता कैसे बहायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

इस देश की बगिया में एक चिड़िया चहकती है
इस देश में ही रात की रानी महकती है
हर तरह के मौसमों का देश है मेरा
सावन में धरती भी यहाँ धानी चमकती है
आबाद हो गुलशन बता कैसे सजायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।

     ---------राजेश कुमार राय।--------