फुलवारी में हंसने वाले गुलदानों से मिल लेना
दौलत की तामीर में अकसर उलझे उलझे रहते हो
प्यार मुहब्बत करने वाले दीवानों से मिल लेना
तनहाई की याद सताए तनहाई में जाना हो
तो फिर जंगल और पहाड़ी वीरानों से मिल लेना
आंखें पुरनम हो जायें घनघोर उदासी छा जाये
छत पे चहकती चिड़ियों की तुम मुस्कानों से मिल लेना
तेज हवा से लड़ने का जब तुमको हुनर कुछ आ जाये
तब तुम सागर की लहरों के तूफानों से मिल लेना
पीना वीना छोड़ो अब वैसे ही नशा चढ़ जायेगा
शाम ढले साकी प्याला से मैखा़नों से मिल लेना
रचना कितनी सुंदर है अनुमान अगर कुछ करना है
रचनाएं पढ़ने से पहले उनवानों से मिल लेना
बेहतरीन
ReplyDeleteआभार
सादर
आप का हार्दिक आभार आदरणीय।
Deleteसुंदर गज़ल सर।
ReplyDeleteकाफी समय बाद पढ़ने को मिली आपकी गज़ल।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २० जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
आप का हार्दिक आभार आदरणीया।
Deleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteतहेदिल से शुक्रिया
Deleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deleteसुंदर गजल
ReplyDeleteआप का हार्दिक आभार आदरणीया।
Deleteवाह! बेहतरीन !
ReplyDeleteहार्दिक आभार।
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