Wednesday, 19 August 2026

वज़न जिंदगी का उठाते हो कैसे.......

हरे ज़ख्म अपने छुपाते हो कैसे 
अदाएं हमें तुम दिखाते हो कैसे 

बड़ी दुश्मनी है तो देखेंगे हम भी 
कि तलवार मुझ पर चलाते हो कैसे 

जली जिंदगी पर न निकले फफोले 
बताओ हमें ग़म को खाते हो कैसे 

जहा‌ॅं पर बिताई थी बचपन की दुनियां 
उन्हीं बस्तियों को जलाते हो कैसे 

थका है बदन बोझ सर पर है भारी 
वज़न जिंदगी का उठाते हो कैसे 

रक़ीबों से सौदा रफी़कों से धोखा 
द़गा दे के नजरें मिलाते हों कैसे 

बचाना जरूरी है अपने लिए भी 
मुहब्बत में सब कुछ लुटाते हो कैसे 

किया करते रहते हो वादा सभी से 
मुसलसल ये वादा निभाते हो कैसे 

मिलेगा जो साकी़ तो पूछूंगा उस से 
कि नज़रों से पीना सिखाते हो कैसे 

   ....... राजेश कुमार राय .........

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