Sunday, 18 October 2026
आग ऐसी लगाकर गये आब में.......
Wednesday, 19 August 2026
वज़न जिंदगी का उठाते हो कैसे.......
Saturday, 25 July 2026
लौटेगा इक बार किसी दिन......
Tuesday, 16 June 2026
समंदर रो रहा है अब मुझे आजाद कर दो......
Wednesday, 29 April 2026
मख़मल है पर नींद न आए ..............
Sunday, 18 January 2026
दौलत की तामीर अकसर उलझे उलझे रहते हो ............
Saturday, 31 May 2025
आगे का अंजाम तुम्हारे हाथों में ..........
Saturday, 11 January 2025
संगम का किनारा देखते हैं ......
Sunday, 1 December 2024
मृत्यु अटल है जाना होगा ...........
Saturday, 15 June 2024
ज़िंदान से निकल कर शातिर शहर में आया .........
Sunday, 5 May 2024
अब तेरे पैकर के क़सीदे न पढ़ूंगा..........
Wednesday, 24 August 2022
माना तुमको न्याय मिलेगा................
Wednesday, 6 October 2021
रफ़्ता रफ़्ता आंचों पर ये शह्र उबाला जाएगा.............
Saturday, 9 January 2021
कभी रेगज़ारों से पूछो कि उनके..........
Wednesday, 1 April 2020
अभी हरगिज न सौपेंगे सफ़ीना----------
Thursday, 9 January 2020
शब्द तुम्हारी आँखों से कुछ रोज पिये थे मैंने भी---------------
माज़ी की इक याद है अकसर खुशियों से नहलाती है
मेरे सारे ज़ख्मों को वह सपनों से धो जाती है ।
शब्द तुम्हारी आँखों से कुछ रोज पिये थे मैंने भी
शब्दों की वो प्यास अभी भी रग रग को तड़पाती है ।
किसमत की कमजोरी है या नाविक ही कमजोर हूँ मैं
लोग गुजरते जाते हैं बस नाव मेरी टकराती है ।
सूरज ढलने वाला है इक दीप जला दो चौखट पर
गोधुलि बेला होने पर ये शाम बहुत शरमाती है ।
---------राजेश कुमार राय---------
Saturday, 21 September 2019
लौट चलो ऐ शह्र के लोगों-------------
लौट चलो ऐ शह्र के लोगों अपने अपने गांवों में
जिन पेड़ों को काट रहे हो उसने तुम को पाला है
सारा बचपन तुमने बिताया उन पेड़ों की छावों में
--------राजेश कुमार राय---------
Wednesday, 19 September 2018
बहुत हो चुका अब लगाओ निशाना ................
इलाका तुम्हारा बशर देखना है
कहाँ तक चला है असर देखना है
हुई जिन परिंदों की परवाज़ ऐसी
हमें उन परिंदों के पर देखना है
बहुत हो चुका अब लगाओ निशाना
मुझे अपने दुश्मन का डर देखना है
इशारा समझते हैं हम भी बहुत कुछ
हमें मत बताओ किधर देखना है
असल में सुहानी सी रातों में कैसे
कटेगा ये तनहा सफर देखना है
सजा दे जो गुलशन मिला दे जो सबको
मुहब्बत को अब इस कदर देखना है
लगी आज महफिल चटक चांदनी में
नजारा हमें रात भर देखना है
हजारों गमों में भी लब मुसकुराते
गजब का जिगर है जिगर देखना है
------राजेश कुमार राय------
Tuesday, 29 May 2018
फिर हमें आवाज़ देकर क्यूं पुकारा ये बता दे ........
कौन होगा इस दफा अपना तुम्हारा ये बता दे
टूट कर भी क्यूं तना है इक सितारा ये बता दे
जान कर हैरान हूँ मैं इस चमन की दासतां को
किसने लूटा किसने रौंदा किससे हारा ये बता दे
जब तुम्हारी ज़िंदगी से हम निकल कर चल दिए तो
फिर हमें आवाज़ देकर क्यूं पुकारा ये बता दे
शाम ढलने में अभी कुछ वक्त बाकी रह गया है
इस सफीने को मिलेगा कब किनारा ये बता दे
डूबने वालों को जब तुमको बचाना ही नहीं था
कश्तियाँ फिर क्यूं समंदर में उतारा ये बता दे
तुमने रिश्तों की सियासत में हमें उलझा दिया है
इस तिज़ारत में हुआ कितना ख़सारा ये बता दे
हादसों को रोकने का तुमने वादा भी किया था
हादसा तब क्यों हुआ फिर से दुबारा ये बता दे
---------राजेश कुमार राय---------
Tuesday, 16 January 2018
कि कैसे इक समंदर एक सूरज को निगलता है ........
तुम्हारे दौर का क़ातिल बहुत हुशियार लगता है
हमेशा खून करके फिर जनाजे में भी चलता है
बहुत रफ़्तार में चलना मुनासिब है नहीं यारों
करारी चोट लगने पर कहाँ कोई सम्हलता है
कि उसका हौसला भगवान भी महफूज रक्खेगा
हवा की इस चुनौती में दिया हर रोज जलता है
नज़ारा देखते हैं दूर से सब लोग आ कर के
कि कैसे इक समंदर एक सूरज को निगलता है
जमाने ने उसे इतना सताया देख ले दुनियाँ
हजारों दर्द लेकर वो अकेले में निकलता है
बरसती है जो रहमत आसमां से उपर वाले की
कहीं पर द़िल पिघलता है कहीं पत्थर पिघलता है
हुई जब शाम शम्मा जल गयी अब देख लो मंज़र
हजारों आशिकों का कारवाँ उस पर मचलता है
