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Monday, 2 February 2015

"समन्दर"

हवाओं के सहारे से बहता है समन्दर
तूफानों के इशारे से उफनता है समन्दर
मुहब्बत है करता चाँद से कितना ये समन्दर
चाँद ये कहता है कि प्यारा है समन्दर।

लहरों को सुनों उनसे ये आवाज़ आती है
दुश्मन की चोट से कभी घायल नहीं होना
जिसको समझते हो कि पानी की भीड़ है
दुनियाँ में किसी से नहीं हारा है समन्दर।

मैकदे की शाम को जरा तुम गौर से देखो
लगता है जैसे शाँमे नजारा है समन्दर
नाचतीं हैं इस तरह से शराबों की बोतलें
जैसे किसी नें उसमें उतारा है समन्दर।

एक दुनियाँ ही दूसरी है समन्दर के पेट में
सूरज भी डूबता है समन्दर की बाँह में
शाँमों-सहर इस पर टहलतीं कश्तियाँ
इतिहास से पहले का नज़ारा है समन्दर।

समन्दर सा ज़लवा नहीं देखा है आज तक
राम नें भी उसको नमस्कार किया था
दुनियाँ की तरक्की राज़ उसके ज़हन में
इसलिए हम सब का दुलारा है समन्दर।

........राजेश कुमार राय।........