Saturday, 18 June 2016

टूटने का वहम् पाल के बैठे हैं ये रक़ीब------

तेरी बद्दुआ भी द़िल से लगाऊँगा देखना
शाम ढ़ले घर तेरे आऊँगा देखना।

बेटी है मेरी, खून है, और लख़्ते-ज़िगर भी
उसके लिये हर बोझ उठाऊँगा देखना।

टूटने का वहम् पाल के बैठे हैं ये रक़ीब
मर जाऊँगा पर सर न झुकाऊँगा देखना।

तन्हा हुआ तो क्या हुआ ! इक मैकद़ा तो है
सारी दुआ साकी पे लुटाऊँगा देखना

तेरे लिये ऐ दोस्त जरूरी हुआ अगर
उस बेवफ़ा से हाथ मिलाऊँगा देखना।

हालांकि तेरी रूह मयस्सर न हो सकी
वादा किया था जो भी निभाऊँगा देखना।

दुश्मन है मेरा लाख, मगर वक्त पे "राजेश"
नशेमन मे लगी आग बुझाऊँगा देखना।

         ------राजेश कुमार राय।-------

Thursday, 19 May 2016

रंग ला रहा है चराग़ों का फैसला............

                    (1)
किसी को दर्द क्या देना !  किसी से दुश्मनी कैसी !
ये तेरा ज़िस्म फ़ानी है किसी दिन रूठ जायेगा।

                   (2)
बुजुर्गों के लिये थोड़ी मुहब्बत द़िल मे रख लेना
मुसलसल उम्र ढ़लती है शज़र गिर जायेगा एक दिन।

                   (3)
बड़ी देर तक खड़ा था आईने के रूबरू
लगता था मेरे अक्स मे कोई और आ गया।

                   (4)
रंग ला रहा है चराग़ों का फैसला
इतना जले कि जल के हवा ही बिखर गयी।

                   (5)
जिंदा बचा हुआ है सौ वार झेलकर
जाँबाज ने शमशीर की औकात बता दी।

                   (6)
सारे ग़म डूबो देना हौसलों की चाहत से
ज़िंदगी की वादी में, तब बहार आयेगी।

      --------राजेश कुमार राय।--------

Saturday, 23 April 2016

तब जुगुनूँ भी बज़्म सजानें बैठा है-----------

शकुनी छल से आज लुभाने बैठा है
कोई युधिष्ठिर दाँव लगानें बैठा है।

सारी दुनियाँ बेंच दी बस ऐय्यासी में
अब बंदर का खेल दिखानें बैठा है।

पूरी मेहफ़िल लूट लिया जब चन्दा ने
तब जुगुनूँ भी बज़्म सजानें बैठा है।

राजा बनकर दर्द पियेगा जनता का
राज मिला तो ज़हर पिलानें बैठा है।

सारी बस्ती खाक् हुई तो क़ातिल भी
पानी लेकर आग बुझानें बैठा है।

एक दीवाना लगता है मर जायेगा
उल्फ़त में हर नाज़ उठानें बैठा है।

गद्दार पड़ोसी से थोड़ा होशियार रहो
धोखा देकर लाश बिछानें बैठा है।

हर बेटी नें ठान लिया कुछ करने की
"राजेश" खुशी से ग़ज़ल सुनानें बैठा है।

      --------राजेश कुमार राय।---------

Saturday, 19 March 2016

तेरे कंगन, तेरे पाज़ेब का फागुन है दीवाना..............

बुराई जल गई, अब हो रहीं है प्यार की बातें
कहीं पर रंग की बातें, कहीं द़िलदार की बातें।

चेहरा चाँद जैसा और त़िल भी खूबसूरत है
ज़माना कर रहा है बस तेरे रूख़्सार की बातें।

यहाँ साकी चहकती है, वहाँ माली बहँकता है
यहाँ मैख़्वार की बातें, वहाँ ग़ुलज़ार की बातें।

इन्हीं रंगों की द़रिया में चलो हम डूब जाते हैं
कभी फुर्सत में होगी, फिर तेरे संसार की बातें।

तेरे कंगन, तेरे पाज़ेब का, फागुन है दीवाना
खुमारी चढ़ गयी है अब करो झनकार की बातें।

जरा सी भूल मौसम को कहीं बे-रंग ना कर दे
चलो बच्चों से कर लेते हैं कुछ बेद़ार की बातें।

वफा की राह में"राजेश"अपना हक् अदा कर दे
ज़माना याद रखेगा, तेरे किरद़ार की बाते।

   ----------राजेश कुमार राय।-----------

Friday, 12 February 2016

दिन भर हराम कहता रहा मैंकशी को वो------

                    (1)
इंसान हूँ मगर मैं मुकम्मल न हो सका
शायद मेरे रक़ीब की कुछ बद्दुआ भी है।

                    (2)
दिन भर हराम कहता रहा मैंकशी को वो
शाम जब ढली तो मैकद़े पहुँच गया।

                    (3)
तेरा एहसान मुझ पर है इसे मैं भी समझता हूँ
मगर सबको बताकर तुमनें हल्का कर दिया इसको।

                    (4)
ज़िंदगी माँगकर ख़ुदा से क्या किया तुमनें !
ग़मे-हयात तुम्हे फिर से मार डालेगा।

                    (5)
जुगनूँ ने कहा चाँद से ललकार कर, मुझमें
रौशनी तो बहुत कम है, पर उधार की नहीं।

                    (6)
परिन्दा जब तलक उसका निवाला बन नहीं जाता
कोई मेहफ़िल मसर्रत की कभी पूरी नहीं होती।

                     (7)
इंतज़ार है तेरा, तू मेरे बज़्म में आकर
मेरे ऐतबार की ऐ दोस्त आबरू रख ले।

      -----------राजेश कुमार राय।----------

Wednesday, 30 December 2015

कभी न बुझ सके जो, वो शम्मा जलायेंगे..........

नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे
नेक काम करके गुलशन को सजायेंगे
तूफान चाहे जितनी ताकत लगा ले अपनी
कभी न बुझ सके जो वो शम्मा जलायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

गुमनाम ज़िंदगी से सड़कों पे निकलकर
फूलों से काँटों के रिश्ते को समझकर
मुश्किल हो चाहे जितनीं इस राहे-ज़िंदगी में
मंज़िल के पास जा कर दुनियाँ को दिखायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

सच्चाईयों के राह पे चलते ही रहेंगे
साहिल सा समंदर से लड़ते ही रहेंगे
आओ मेरे पास भटकते हुये लोगों
नये वर्ष को हम सब मिल के मनायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

ईमाँन से रहोगे तरक्की भी रहेगी
दोस्तों में प्यार की गंगा ही बहेगी
सूरज की रौशनी में सितारे भी दिखेंगे
चैन की बंशी हम दुनियाँ को सुनायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

कभी न बुझ सके जो, वो शम्मा जलायेंगे
नये साल में हम तक्द़ीर बनायेंगे।

-----------राजेश कुमार राय।------------

Saturday, 14 November 2015

हाले-दिल को राज़ बनाकर दर्द बढ़ाया है मैनें.........

जुल्म बहुत है, कहाँ है ईश्वर, कब लेंगे अवतार बता
सारी दुनियाँ भाग रही है, तुम अपनी रफ़्तार बता।

हर रोज तरक्की होती है, अफ़सोस खज़ाना खाली है
किन हाथों से लुटता भारत जुड़ा कहाँ है तार बता।

हिज्र का मारा, शाख पे बैठे एक परिंदे से पूछा
प्यार के ज़ख्मी कुछ तो बोलो, पड़ी कहाँ है मार बता।

चारो तरफ एक कोलाहल है दहशत जैसा मंज़र है
बिना वजह के लाश बिछी है, कैसी है तलवार बता।

हाले-दिल को राज़ बनाकर दर्द बढ़ाया है मैनें
दिल की बातें रफ़्ता-रफ़्ता कर दूँ क्या इज़हार बता।

पानी का अम्बार लगा है मेघ बरसते जाते हैं
बाढ़ बहुत है, टूटी कश्ती, उतरूँ कैसे पार बता।

इस शहरे-जुदाई में मैनें अफ़सोस बहुत कुछ खोया है
सब धरती-अम्बर उसका है तो मेरा क्या है यार बता।

बेटा-बेटी पूरक हैं तो भेद यहाँ क्यों होता है
बेटा सोये बेटी रोये, ये कैसा अधिकार बता।

       -----------राजेश कुमार राय।----------

Thursday, 8 October 2015

दुकानें बन्द कर दो अब, दुआएँ बेचने वालों.....

                       (1)
दुकानें बन्द कर दो अब दुआएँ बेचने वालों
जमाना खुद बनायेगा मुकद्दर देख लेना तुम।

                       (2)
मुद्दतों बाद उसके हक् में फैसला आया
जिसके इंतज़ार मे साँसें ठहर गयी उसकी।

                       (3)
साकी ने दिया ज़ाम मगर बेरूखी के साथ
ऐसे में मैकशों को नशां खाक् चढ़ेगा।

                      (4)
गरीबों, के उजालों को छीनने वाला
तड़प-तड़प के अधेरों में मर गया आखिर।

                      (5)
परिंदा मार करके जीत का तुम जश्न करते हो
उनकी बद्दुआ से क्या तुम्हे कुछ डर नहीं लगता।

                      (6)
नजरें घड़ी पर, और बेचैनी से लगता है
कि महबूब ने मिलने का वादा कर लिया उससे।

    --------राजेश कुमार राय।-------

Saturday, 5 September 2015

मौंत नें जाल उस पर कसा इस कदर.......

कुचल करके सड़कों पे मारा गया
क्या तुम्हारा गया, क्या हमारा गया?

उस माँ पे क्या गुजरी है पूछो जरा
जिसके आँचल का कोई सितारा गया।

भँवर में फँसा था, तो कोई न आया
बस साहिल से मुझको पुकारा गया।

मौंत नें जाल उस पर कसा इस कदर
कि, वो मक्तल से आ के दुबारा गया।

सब फ़रिश्ते सफर में भटकते रहे
और सियासत में ज़ालिम सँवारा गया।

एक बेटी तरसती रही उम्र भर
प्यार, बेटे के हिस्से में सारा गया।

मैकद़ा, मैकद़ा ढूँढता रह गया
वो साकी गयी, वो नज़ारा गया।

जिसकी गवाही अहम थी उसे,
मौंत के घाट पहले उतारा गया।

---------राजेश कुमार राय।--------

Saturday, 1 August 2015

वरना इसी चराग़ ने सब कुछ जला दिया.......

                          (1)
कुछ बेबसी थी ऐसी तारीफ़ कर रहा था
वरना इसी चराग़ ने सब कुछ जला दिया।

                          (2)
झूठ के शहर में, अफवाह गर्म है
साकी भी बिक गयी है मेंरे मैकद़े के साथ।

                          (3)
अव्वल रहीं है बेटियाँ उस इम्तेहान में
जहाँ से मुल्क के सबसे बड़े हाक़िम निकलते है।

                          (4)
अब्र के टुकड़ों पे भरोसा करके
आ फसलों को सूरज के हवाले कर दें।

                          (5)
तुम जा रहे हो? ठीक है! मेरी याददाश्त भी लेते जाओ,
तेरी यादों के पुलिन्दे मुझे हँसनें नहीं देगें।

                          (6)
वो जिस जगह जाता है बस इक आग सी लगती है
बारूद से उसका कोई रिश्ता पुराना है।

                         (7)
एक तश्वीर बनाता रहा मैं सारी जिंदगी
ये सोचकर कि शायद इसमें जान आ जाये।

     --------राजेश कुमार राय।--------

Saturday, 4 July 2015

सैय्याद भी फँसेगा किसी जाल में एक दिन----

हाथों से अपनें ज़ाम पिलाकर तो जरा देख
फूल कोई द़िल में खिलाकर तो जरा देख।

बेटियाँ भी दर्द तेरा दूर करेगीं
प्यार से दामन में बिठाकर तो जरा देख।

हौसला कितना है अभी शेष ज़िगर में
तूफान में में कश्ती को नचाकर तो जरा देख।

आईना भी सहम जायेगा ज़ानिब तेरे आकर
ठीक से नज़रों को मिलाकर तो जरा देख।

कामयाबियों के दिन भी आयेगें तेरे घर
पलकों पे कोई ख्वाब सजाकर तो जरा देख।

चाँद भी बेताब है दीदार की ख़ातिर
घूँघट को चेहरे से उठाकर तो जरा देख।

सैय्याद भी फँसेगा किसी जाल में एक दिन
"राजेश" अपना जाल बिछाकर तो जरा देख।

-------------राजेश कुमार राय।--------------

Wednesday, 3 June 2015

रात चाँदनीं, लोग जुटेगें, सोचो क्या मंज़र होगा------

                              (1)

रात चाँदनीं, लोग जुटेगें, सोचो क्या मंज़र होगा
जब दर्द बँटेगा रात कटेगी दीवानों की महफ़िल में।

                              (2)

बेसबब सवाल, बहुत पूछते हो आज
क्या तुम्हारा दर्द भी हद पार कर गया ?

                              (3)

मेरा दिल बहुत उदास सा रहता है आजकल
ये उसके तग़ाफुल का असर है शायद।

                              (4)

इंसान को मज़हब में बाँटनें वालों
खूँन का रंग बदल दो तो मैं तुमको जानूँ।

                             (5)

कभी बाढ़, सुनामी तो कभी ज़लज़ला आया
कहीं किश्तों में कयामत का सिलसिला तो नहीं है !

                             (6)

किसी की बादशाहत से मुझे कुछ भी नहीं लेना
मगर ये भी जरूरी है कि सबकी भूख मिट जाये।

                             (7)

कुछ ज़ख्म तुम्हारे दिल में है, कुछ दर्द रफ़ीकों से लेकर
"राजेश" मुकम्मल होनें का कुछ तुम भी लुत्फ उठा लेना।
    
     -----------राजेश कुमार राय।----------

Saturday, 2 May 2015

ज़ुल्म करता है एक ताज़ियाना यहाँ.......

होश वालों जरा तुम भी आना यहाँ
साकी की नज़र आज़माना यहाँ।

हर तरह की कसक भूल जाओगे तुम
मैक़दे की कसम डूब जाना यहाँ।

बचकर निकलना तो मुश्किल है अब
हर नज़र है बहुत क़ातिलाना यहाँ।

सबकी ज़ुबाँ पर है पहरा लगा
ज़ुल्म करता है एक ताज़ियाना यहाँ।

जीत की चाहतों को लिये फिर रहा
अब मुझको नहीं मात खाना यहाँ।

बेटे के लिये तुम तड़पते हो क्यूँ?
बेटी का भी हाज़िर है शाना यहाँ।

हवा के असर से है मुमकिन "राजेश"
टूट जायेगा एक आशियानाँ यहाँ।

......राजेश कुमार राय।........