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Wednesday, 7 January 2015

हिमालय की चीख

विधि नें यह खेल जो खेला है
यह महाप्रलय की बेला है,
धरती की चित्कार है यह
और पर्वत की ललकार है यह
दरिया की उफनती धारों से
इन्सानों को फटकार है यह
अब चलो प्रकृति के पार चलो
अब चलो प्रकृति के पार चलो।

देवभूमि पर इन्सानों का
बहुत दिनों से हमला था
चोटें खाता बार-बार और
बार-बार वह सम्हला था
पर्वत,नदियाँ क्रुद्ध हुँई तो
लाश बिछ गया पावन में
ईश्वर की महिमा को देखो
आग लगा दी सावन में
हम भी रोये तुम भी रोये
रोनें का कुछ लाभ नहीं,
नहीं बचा है नहीं बचा
मत पीड़ा अपरम्पार करो
चलो प्रकृति के पार चलो
अब चलो प्रकृति के पार चलो।

जिस जगह से गंगा चलती है
यमुना भी वहीं निकलती है
वह पत्थर नहीं हिमालय है
ऋषि मुनियों का विद्यालय है
इस शान्ति भूमि पर इन्सानों नें
बहुत ही शोर मचाया है
चिल्लाता हूँ ऐ शैल शिखर
तुम जलो-जलो तुम और जलो
यहाँ रहना बहुत कठिन है प्रिये
अब चलो प्रकृति के पार चलो
अब चलो प्रकृति के पार चलो।

कितनों के सपनें टूट गये
कितनों के अपनें रूठ गये,
प्रकृति का यह प्रतिकार हुआ
और मेघपुरी वार हुआ,
मानव की रचना बिखर गयी
इंसा की तबियत सिहर गयी
जिस जगह से मुक्ति मिलती थी
जीवन की कलियाँ खिलती थी
उस तपोभूमि के मंदिर का
सब खत्म हुआ बाजार चलो
अब चलो प्रकृति के पार चलो
अब चलो प्रकृति के पार चलो।

पर्वत के अंचल की धरती
सिसक-सिसक कर कहती है
जुल्म हमारे बहुत दिनों से
धीरज पूर्वक सहती है
शान्त हो गया क्रोध वहाँ का
फिर से प्रेम बुलायेगा
दिव्यलोक का पैगम्बर
कुछ नियम बतानें आयेगा,
जय, जय हो गंगोत्री का
और यमुनोत्री की धार चलो
चमन हमारे रूद्रलोक का
होगा फिर गुलज़ार चलो,
अब चलो प्रकृति के पार चलो
अब चलो प्रकृति के पार चलो।
.........राजेश कुमार राय।.........