Wednesday, 29 April 2026

मख़मल है पर नींद न आए ..............

कोना कोना छान लिया है 
तुम न मिलोगे मान लिया है 

दुशमन खोज के मारा जाये 
हमने तो ये ठान लिया है 

द्वार खुले हैं समझौतों के 
बंदूकें भी तान लिया है 

घर में बैठे गद्दारों को 
हमने अब पहचान लिया है 

कितनी पी है किस मैकश़ ने 
साक़ी ने सब जान लिया है 

मख़मल है पर नींद न आए 
ये कैसा दीवान लिया है 

जब जब प्यास लगी सागर को 
बादल का अहसान लिया है 

....... राजेश कुमार राय .........







Sunday, 18 January 2026

दौलत की तामीर अकसर उलझे उलझे रहते हो ............

चलते चलते राहों में कुछ अनजानों से मिल लेना 
फुलवारी में हंसने वाले गुलदानों से मिल लेना 

दौलत की तामीर में अकसर उलझे उलझे रहते हो 
प्यार मुहब्बत करने वाले दीवानों से मिल लेना 

तनहाई की याद सताए तनहाई में जाना हो 
तो फिर जंगल और पहाड़ी वीरानों से मिल लेना 

आंखें पुरनम हो जायें घनघोर उदासी छा जाये 
छत पे चहकती चिड़ियों की तुम मुस्कानों से मिल लेना 

तेज हवा से लड़ने का जब तुमको हुनर कुछ आ जाये 
तब तुम सागर की लहरों के तूफानों से मिल लेना 

पीना वीना छोड़ो अब वैसे ही नशा चढ़ जायेगा 
शाम ढले साकी प्याला से मैखा़नों से मिल लेना 

रचना कितनी सुंदर है अनुमान अगर कुछ करना है 
रचनाएं पढ़ने से पहले उनवानों से मिल लेना 

       ............ राजेश कुमार राय ............