लौट चलो ऐ शह्र के लोगों अपने अपने गांवों में
जिन पेड़ों को काट रहे हो उसने तुम को पाला है
सारा बचपन तुमने बिताया उन पेड़ों की छावों में
--------राजेश कुमार राय---------
इलाका तुम्हारा बशर देखना है
कहाँ तक चला है असर देखना है
हुई जिन परिंदों की परवाज़ ऐसी
हमें उन परिंदों के पर देखना है
बहुत हो चुका अब लगाओ निशाना
मुझे अपने दुश्मन का डर देखना है
इशारा समझते हैं हम भी बहुत कुछ
हमें मत बताओ किधर देखना है
असल में सुहानी सी रातों में कैसे
कटेगा ये तनहा सफर देखना है
सजा दे जो गुलशन मिला दे जो सबको
मुहब्बत को अब इस कदर देखना है
लगी आज महफिल चटक चांदनी में
नजारा हमें रात भर देखना है
हजारों गमों में भी लब मुसकुराते
गजब का जिगर है जिगर देखना है
------राजेश कुमार राय------
कौन होगा इस दफा अपना तुम्हारा ये बता दे
टूट कर भी क्यूं तना है इक सितारा ये बता दे
जान कर हैरान हूँ मैं इस चमन की दासतां को
किसने लूटा किसने रौंदा किससे हारा ये बता दे
जब तुम्हारी ज़िंदगी से हम निकल कर चल दिए तो
फिर हमें आवाज़ देकर क्यूं पुकारा ये बता दे
शाम ढलने में अभी कुछ वक्त बाकी रह गया है
इस सफीने को मिलेगा कब किनारा ये बता दे
डूबने वालों को जब तुमको बचाना ही नहीं था
कश्तियाँ फिर क्यूं समंदर में उतारा ये बता दे
तुमने रिश्तों की सियासत में हमें उलझा दिया है
इस तिज़ारत में हुआ कितना ख़सारा ये बता दे
हादसों को रोकने का तुमने वादा भी किया था
हादसा तब क्यों हुआ फिर से दुबारा ये बता दे
---------राजेश कुमार राय---------
तुम्हारे दौर का क़ातिल बहुत हुशियार लगता है
हमेशा खून करके फिर जनाजे में भी चलता है
बहुत रफ़्तार में चलना मुनासिब है नहीं यारों
करारी चोट लगने पर कहाँ कोई सम्हलता है
कि उसका हौसला भगवान भी महफूज रक्खेगा
हवा की इस चुनौती में दिया हर रोज जलता है
नज़ारा देखते हैं दूर से सब लोग आ कर के
कि कैसे इक समंदर एक सूरज को निगलता है
जमाने ने उसे इतना सताया देख ले दुनियाँ
हजारों दर्द लेकर वो अकेले में निकलता है
बरसती है जो रहमत आसमां से उपर वाले की
कहीं पर द़िल पिघलता है कहीं पत्थर पिघलता है
हुई जब शाम शम्मा जल गयी अब देख लो मंज़र
हजारों आशिकों का कारवाँ उस पर मचलता है
किसने लूटा घर मेरा तनहाई में
अब किसका है हांथ मेरी रूसवाई में
बरसों पहले जख्म दिया तूने मुझको
दर्द उठा है आज वही पुरवाई में
मुंसिफ की हर बात मेरी सर आंखों पर
जाने दो अब क्या रक्खा सुनवाई में
एक जनाजा निकला है बिन मौसम का
सरहद पर जब जान गयी तरूणाई में
उसकी बेबस आंखों का पानी देखो
सारा दोष निकालो मत हरजाई में
गौहर खातिर आंख ही उसकी काफी है
मत डूबो तुम सागर की गहराई में
खंजर तेरा और मेरे सर का सजदा
टूट गया हूँ पल पल तेरी लड़ाई में
---------राजेश कुमार राय---------
धीरे धीरे दुल्हन अपने घर में गई
सोचते सोचते फिर पिहर में गई
आज सूरज ढलेगा तो देखेंगे हम
उसकी अस्मत कहाँ किस दहर में गई
जाने वाली हवा से ये पूछूंगा मैं
ये बता दे तू किसके असर में गई
बालपन में मुझे खोजते खोजते
माँ की ममता भरी दोपहर में गयी
पैर नूपुर सजा पेट के वासते
इक हसीना बता किस शहर में गई
सारे लोगों ने खोजा मगर ना मिला
उसको जाना था सच्ची नजर में गई
आसमां से चला कब तलक आयेगा
जिंदगी मुफलिसों की सबर में गई
उसकी किसमत बयाँ किस तरह मैं करूँ
जिसकी दुनियाँ ही ज़ेरे जबर में गई
--------राजेश कुमार राय---------
सौ दर्द भरे अफसानों में इक मेरा भी अफसाना है
इक तेरे तबस्सुम की ख़ातिर मुझे गीत वफा के गाना है
कुछ कर्म हमारे हाथों में कुछ है तेरी मंजूरी भी
दस्तूर यही इस दुनियां का कुछ खोना है कुछ पाना है
तू ही तो सब कुछ है पर तसक़ीम समझना है मुश्किल
कुछ को मिला सिफर हाथों में कुछ को मिला ख़जाना है
इमदाद मुझे ईमानों की कुछ और जरा दे दे साक़ी
मैं रिन्द हुँ तेरी आंखों का उस पार मुझे भी जाना है
जब जन्म लिया इस धरती पर हक मेरा भी तसलीम करो
जिन कन्धों पर यह देश टिका उसमें मेरा भी शाना है
वादा करना कायम रहना इतना तो आसान नहीं था
तुम एक जनम में ऊब गये मुझे सातों जनम निभाना है
बस इक जरा सी हरकत से ही प्यार तुम्हारा टूट गया
अब वक्त कहाँ है हाथों में बस जीवन भर पछताना है
---------राजेश कुमार राय---------
कोई खुशी है या कोई गम है
आँख हमारी क्यों पुरनम है
प्यार तुम्हारा मेरा ख़जाना
जितना दे दो उतना कम है
तेरा बरसना या चुप रहना
या तो सागर या शबनम है
कितना खुश है आज परिंदा
दश्त में जैसे एक ज़मज़म है
एक सियासत लाखों चेहरे
वो रहबर है या रहजन है
साथ नहीं हो फिर भी लगता
साथ तुम्हारा यूँ हर दम है
बज़्मे-सुखन में तेरा आना
हर मौसम में इक मौसम है
मेरा दुश्मन दोस्त है उसका
रिश्तों में कितनी उलझन है
------राजेश कुमार राय------
प्यार भी दुश्वार है दुनियाँ की नजर में
साहिल पे बहुत शोर है चल बीच भंवर में
इक शख़्स अपनी हार से इतना ख़फा हुआ
कहता है जहर और दे कश्कोले-जहर में
सोचता था तेरे नाम का एक शेर लिखूंगा
आज तक उलझा रहा ग़ज़लों के बहर में
लौट के आना था सो मैं आ गया मगर
मेरी रूह तड़पती है मुकद्दर के शहर में
हम सब को लूट कर वो विलायत चला गया
अक़्सर दिखाई देता है दुनियां की ख़बर में
पत्थर चलाये जा रहे एक दूसरे पे सब
सूझता है कुछ नहीं जुल्मत के कहर में
मुतमइन हूँ बादशाह के हर फैसले से मैं
एक उम्मीद दिख रही है पैगामे-शजर में
----------राजेश कुमार राय---------
ज़िस्म इंसान का है कुछ तो ख़ताएँ होंगी
ज़िंदगी का है सफ़र कुछ तो बलाएँ होंगी
उसके लहज़े में महकती है वतन की खुशबू
कुछ मिट्टी का असर, माँ की दुआएँ होंगी
एक तिनके को जलाने में जल गई बस्ती
मेरा दावा है कि साज़िश में हवाएँ होंगी
हल्का हल्का ही सही कान में टकरातीं हैं
खुश्क मौंसम में परिंदों की सदाएँ होंगी
एक पागल भी मोहब्बत में सोचता होगा
मेरे महबूब के ज़ुल्फों में अदाएँ होंगी
अब उस पार ही हम सब का फैसला होगा
जैसा किरदार है वैसी ही सज़ाएँ होंगी
आखिरी वक्त में सामाने-सफ़र क्या होगा
एक मिट्टी का बदन, चंद रिदाएँ होंगी
--------राजेश कुमार राय-------
मायूसी है भारीपन है कुछ दर्द पिघलना बाकी है
थोड़ा और कुरेदो ज़ख्मों को कुछ अश्क़ निकलना बाकी है
दुनियां की चालों में फंसकर कुछ तेवर मेरा बदला है
ऐ यार जरा ठोकर दे दे कुछ और सम्हलना बाकी है
दीपक की जलती लौ को तुम कुछ और बढ़ाकर तेज करो
जलने वाले परवानों का कुछ और मचलना बाकी है
ऐ इश्क़ बहुत उलझाया है थोड़ा और हमें उलझा देना
जीवन की बीच दोपहरी में थोड़ा और उलझना बाकी है
भारत के दुश्मन का देखो क्या हश्र हुआ अरमानों का
कुछ अरमां उनके कुचल गए कुछ और कुचलना बाकी है
ऐ मेरे प्रियतम और सजो कुछ और तुम्हारे सजने से
द़िल मेरा बहुतों उछल चुका कुछ और उछलना बाकी है
माहौल हमारा ऐसा हो कि बेटी का सम्मान बढ़े
जग थोड़ा थोड़ा बदला है कुछ और बदलना बाकी है
---------राजेश कुमार राय।--------
आँखों में नशेमन ढ़ो रहा है
किसी की याद में बस रो रहा है
आँचल माँ का फिर से पा गया है
कई दिन से मुसलसल सो रहा है
हमेशा ज़ुल्म से लड़ता रहा जो
वही क़ातिल का खंज़र धो रहा है
बदलते दौर में इंसाँ की फितरत
मसल कर फूल काँटे बो रहा है
बहुत दिन बाद बेटी घर को आयी
खुशी से बाप पागल हो रहा है
उसी को याद करती है रियाया
ज़माने का दुलारा जो रहा है
माज़ी का द़रीचा खोल कर के
कोई ". राजेश" उसमें खो रहा है
--------राजेश कुमार राय।--------
इस दौर के रिश्ते बड़े नाजुक से होते हैं
कभी वो मुस्कुराते हैं, कभी पलकें भीगोते हैं
जरा सी बात पर ही द़िल में इनके दर्द उठता है
मझधार में ही प्यार के रिश्ते डूबोते हैं
टुटन का दौर जारी है बता कैसे बचायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा ।
बहते हुए दरिया के पानी में रवानी है
इस मुल्क़ की नदियों की कुछ अपनी कहानी है
कूड़ाघर समझते हो जिसे ऐ मुल्क़ के लोगों
वही गंगा हमारे देश की सच्ची निशानी है
सब लोग सोये हैं बता कैसे जगायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।
ईद और होली यहाँ मिलकर मनाते हैं
ज़ंगे-आजादी के सब किस्से सुनाते हैं
जरा सी बात क्या बिगड़ी कि नैज़े बात करते हैं
सियासी लोग अपने हक़ में ही मौका भुनाते हैं
अमन की राह में अब इक दिया कैसे जलायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।
भाई का भाई अब नहीं होता यहाँ कोई
किसी का दर्द लेकर अब नहीं रोता यहाँ कोई
दूसरों का वक्त जितना मिल सके ले लो
पर वक्त अपना अब नहीं खोता यहाँ कोई
अब प्यार की गंगा बता कैसे बहायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।
इस देश की बगिया में एक चिड़िया चहकती है
इस देश में ही रात की रानी महकती है
हर तरह के मौसमों का देश है मेरा
सावन में धरती भी यहाँ धानी चमकती है
आबाद हो गुलशन बता कैसे सजायें हम
हमे भी सोचना होगा तुम्हें भी सोचना होगा।
---------राजेश कुमार राय।--------