Sunday, 18 October 2026

आग ऐसी लगाकर गये आब में.......

हम वहीं रह गए सब बदलते रहे 
एक ही चाल से हम भी चलते रहे 

इक दिया बन के चौखट पे तेरे सनम
जिंदगी भर उसी दर पे जलते रहे 

शाम को दिन का सारा थकन छोड़कर 
हम भी सूरज की मानिंद ढलते रहे 

आग ऐसी लगाकर गये आब में 
सब समंदर में रहकर उबलते रहे

जब भी देखा तुझे मैं दुखी साक़िया 
अश्क़ मेरे नयन से निकलते रहे 

बर्फ रिश्तों में अपने जमी, तोड़कर 
तुम पिघलते रहे हम पिघलते रहे 

मौंत आने से पहले सभी, दोस्तों 
मौंत के ही तो पीछे टहलते रहे 

जिसका था जो नगीना वही ले गया 
औ मुनाफ़िक हथेली को मलते रहे 

उनके बारे में भी कुछ कसीदे पढ़ो 
हार के बाद भी जो संभलते रहे 

एक तूफान आया शज़र गिर पड़ा 
सब परिंदे शज़र के भटकते रहे 

रिंद आये मगर मैकद़ा बंद था 
बिन पिए रात भर सब बहकते रहे 

  -------राजेश कुमार राय --------

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