ख़ुदा के वासते बस घर मेरा आबाद कर दो
चलो अच्छा हुआ तुम लोग आए साथ मिलकर
ज़मीनों आसमां सागर सभी को शाद़ कर दो
अगर अपना पड़ोसी है मुसीबत में कहीं भी
जरूरत में जरुरत भर उसे इमदाद कर दो
किसी के प्यार में पड़ना मगर नाकाम होना
कहां तक ठीक है खुद को मियां बरबाद कर दो
बेहतरीन ग़ज़ल सर।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १९ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
उम्दा ग़ज़ल
ReplyDeleteबेहतरीन रचना
ReplyDeleteइस ग़ज़ल में इंसानियत, मोहब्बत और समाज के प्रति जिम्मेदारी का गहरा संदेश छिपा है। खासकर पड़ोसी की मदद करने वाली बात दिल को छू जाती है, क्योंकि मुश्किल समय में इंसान ही इंसान के काम आता है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
ReplyDeleteअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद