मिल जाएंगे यार किसी दिन
द़िल में रखना ठीक नहीं है
कर देना इज़हार किसी दिन
उसकी गली से रोज गुजरना
शायद हो दीदार किसी दिन
साक़ी का भी पूरा होगा
सपनों का संसार किसी दिन
मुझ से बिछड़कर जाने वाला
लौटेगा इक बार किसी दिन
हर लत का अंजाम बुरा है
कर देगा बीमार किसी दिन
मत भर नाव को हद से ज्यादा
डूबेगी मझधार किसी दिन
समझौता गर कर न सके तो
निकलेगी तलवार किसी दिन
द़िल से कोशिश करते रहना
होगी नैया पार किसी दिन
बहुत ही प्यारी दिलकश गज़ल राजेश जी! अरसे बाद आपके ब्लॉग पर आकर बहुत ख़ुश हूँ! बहुत सुंदर रचना के लिए हार्दिक आभार और शुभकामनायें 🙏
ReplyDeleteआप का हार्दिक आभार आदरणीया
Deleteलाज़वाब गज़ल है सर।एक से बढ़कर एक शेर वाह।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २८ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
आप का हार्दिक आभार आदरणीया
Deleteवाह
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय
Deleteबेहतरीन शायरी
ReplyDeleteआप का हार्दिक आभार आदरणीया
Deleteवाह!लाजवाब!
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया
Deleteअति सुन्दर
ReplyDeleteआप का हार्दिक आभार
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ReplyDeleteमुझ से बिछड़कर जाने वाला
लौटेगा इक बार किसी दिन
हर लत का अंजाम बुरा है
कर देगा बीमार किसी दिन
वाह वाह वाह 🙏 बहुत ही सुंदर रचना, सादर प्रणाम आपको और आपकी लेखनी को 🙏
आप का हार्दिक आभार आदरणीय
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