अदाएं हमें तुम दिखाते हो कैसे
बड़ी दुश्मनी है तो देखेंगे हम भी
कि तलवार मुझ पर चलाते हो कैसे
जली जिंदगी पर न निकले फफोले
बताओ हमें ग़म को खाते हो कैसे
जहाॅं पर बिताई थी बचपन की दुनियां
उन्हीं बस्तियों को जलाते हो कैसे
थका है बदन बोझ सर पर है भारी
वज़न जिंदगी का उठाते हो कैसे
रक़ीबों से सौदा रफी़कों से धोखा
द़गा दे के नजरें मिलाते हों कैसे
बचाना जरूरी है अपने लिए भी
मुहब्बत में सब कुछ लुटाते हो कैसे
किया करते रहते हो वादा सभी से
मुसलसल ये वादा निभाते हो कैसे
मिलेगा जो साकी़ तो पूछूंगा उस से
कि नज़रों से पीना सिखाते हो कैसे
लाज़वाब गज़ल सर।
ReplyDeleteसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २१ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
किया करते रहते हो वादा सभी से
ReplyDeleteमुसलसल ये वादा निभाते हो कैसे
सुंदर
वंदन
वाह!! असंभव को संभव करने की कला सिखाती है यह ग़ज़ल
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteशानदार
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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